Gangaur Geet

राजस्थान की संस्कृति में बहुत सारे त्यौहार उत्सव मनाया जाते हैं इन्हीं त्योहारों और उत्सवों की श्रंखला में गणगौर  का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, गणगौर का पर्व है राजस्थान में होली दहन के 18 दिन पश्चात गणगौर की पूजा की जाती है, राजस्थान में इस वर्ष 8 मार्च से 22 मार्च तक की गणगौर का पर्व मनाया जा रहा है गणगौर की पर्व   के लिए यदि आप गणगौर के गीत,Gangaur Geet,Gangaur song lyrics,gangaur geet in hindi,gangaur geet lyrics in hindi,gangaur pujne ke geet,gangaur ke geet, ढूंढ रहे हैं तो बिल्कुल सही जगाए हैं हमने यहां पर आपके लिए गणगौर के गीत,Gangaur Geet,Gangaur song lyrics,  इस लेख में उपलब्ध करवा रहे हैं

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गणगौर का इतिहास

गणगौर का प्रसिद्ध मेला जयपुर में लगता है यह मेला राजस्थान का प्रसिद्ध मेला यह मेला प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल तीज और चौथ को जयपुर के मुख्य मार्ग त्रिपोलिया बाजार गंगौरी बाजार और चौगान में धूमधाम से लगता है
गणगौर मेले की परंपरा गणगौर हमारी भारतीय संस्कृति से जुड़ी परंपरा का पर्व है यह कुंवारी कन्या विवाहित अपनी सौभाग्य के लिए गौरी पूजन करती है गोरी ने शिव को पति रूप में पाने के लिए यह व्रत रखा था इस मेले का सूत्र इसी पौराणिक कथा से जुड़ता है गोरी की मिट्टी की प्रतिमाएं बनाकर घर में रखी जाती है तथा 16 दिन तक उन प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है इन प्रतिमाओं का विसर्जन करना ही गणगौर मेले का उद्देश्य है gangaur geet lyrics in hindi,gangaur pujne ke geet,gangaur ke geet,

गणगौर महोत्सव

जयपुर के गणगौर मेले को देखने के लिए देश तथा विदेशी पर्यटक भी आते हैं राजस्थान के विभिन्न गांव से आने वाले लोग रंग-बिरंगे पोशाके पहनते हुए मेले में सम्मिलित होते हैं स्त्रियों की टोलियां लोकगीत गाती हुई चलती है संध्या को निश्चित समय पर राज महल के त्रिपोलिया बाजार से गणगौर की सवारी धूमधाम से निकाली जाती है सवारी से आगे आगे हाथी ऊंट रखे होते हैं इनके साथ पुलिस बैंड चलते हैं गणगौर की सवारी सुंदर ढंग से सजी पालकी में चलती है यह जुलूस त्रिपोलिया बाजार से छोटी चौपड़ होता हुआ गंगौरी बाजार तक जाता है यहां अनेक प्रकार के मनोरंजन के साधन खाने पीने के सामान आदि रहते हैं मेलों के आयोजन से हमारी संस्कृति परंपराएं जीवित रहती है हमें अपनी संस्कृति एवं लोक परंपराओं की जानकारी होती है उनके प्रति हमारे मन में आस्था जागृत होती है यदि आधुनिकता के प्रभाव से मेलों में कुछ बुराइयां भी देखने को मिलती है फिर भी मेलों का आयोजन सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक व्यापारी का ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है

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गणगौर के गीत,Gangaur Geet

म्हारा ईशरजी म्हारे साथ, कुआ पर यूं रे खड़ने रे।। गारा के गणगौर…

माथा ने भांवर सुहाय, तो रखड़ी जड़ाव की रे।

कान में झालज सुहाय, तो झुमकी जड़ाव की रे।। गारा के गणगौर…

मुखड़ा ने भेसर सुहाय, तो पर्ल जड़ाव का रे।

हिवड़ा पे हांसज सुहाय, तो दुलड़ी जड़ाव के रे।। गारा के गणगौर…

तन पे सालू रंगीलो, तो अंगिया जड़ाव के रे।

हाथों में चुड़ौला पहनावा, तो गजरा जड़ाव का रे।। गारा के गणगौर…

पावों में पायल पहनती हैं, तो घुंघरू जड़ाव का रे।

उंगली में बिछिया सुहाय, तो अनवट जड़ाव का रे।। गारा के गणगौर

Gangaur song lyrics

गौर – गौर गोमनी, ईसर पूजे पार्वती, पार्वती का आला – वेट, गौर का सोना का टीका, टीका दे टिमका दे रानी, व्रत करियो गौरा दे रानी। करता – आस आयो , वास आयो । खेरे – खाण्डे लाडू ल्यायो, लाडू ले वीरा न दियो, वीरो ले मने चूँड़ दीनी, चूँड़ ले मने सुहाग दियो । वीरो ले मने पाल दी, पाल को मैं बरत करयो। सन – मन सोला , सात कचौला , ईसर गौरादोन्यू जोड़ी । जोड़ जवाराँ गेहूँ चौथा, रानी पूजे राज में। मैं म्हाके स्वाग में , रानी को घटा राजतो जाय , म्हाको स्वाग शुद्धो जाय । कीड़ी की दी कीड़ी ले , कीड़ी थारी जात ले । जात ले गुजरात ले, गुजरात्यां रो पाणी, देदे तम्बा ताणी, ताणी में सिंघाड़ा, बाड़ी में बिजोरा। म्हारो बाई एमल्यो, पेमल्यो म्हारो बाई एमल्यो सेमल्यो, सिघाड़ाल्यो, झर झरती जलेबी ल्यो, नी भावे तो और ल्यो, सोई ल्यो। (यह आठ बार बोला गया है) अंत में एक ल्यो , दो ल्यो , तीन ल्यो , चार ल्यो , पांच ल्यो , सचित्र ल्यो , सात ल्यो और आठ ल्यो ।

Gangaur ke geet lyrics

ईसरदास बीरा लीलड़ी पालना क
टिक्की ल्यादो जड़ाव की जी ।

कानीराम बीरा लीलड़ी पालना क
टिक्की ल्यादो जड़ाव की जी ।

टिक्की चेप हेमाजलजी की धीय क
ब्रह्मादासजी की बहू जी।

टिक्की चेप साजनियारी धीय क
ब्रह्मादासजी की बहू जी।

गणगौर को पानी पिलाने का गीत

गणगौर पूजा

  • गणगौर व्रत के दिन महिलाएं उपवास रखती हैं और पूजा करने के पश्चात ही अन्न ग्रहण करती हैं।
  • गणगौर की मूर्ति मिट्टी से बनाई जाती है उसके पश्चात सारे शृंगार किए जाते हैं
  • विशेष रूप से गणगौर माता को महावर और सिंदूर चढ़ाया जाता है
  • यह सिंदूर ही सुहागिन महिलाएं अपनी मांग में भरती हैं।
  • गणगौर माता को चढ़ाया प्रसाद पुरूष नहीं खाते हैं।
  • गणगौर माता की पूजा करने के बाद महिलाएं कथा सुनती हैं।
  • पूजा करने के पश्चात शाम को विसर्जित कर दिया जाता है

 

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